आज मैं तुम्हारे साथ नही हूँ,
मैं वक़्त के साथ हूँ-
तुमसे जुड़ी हर आहट से वाकिफ़ हूँ,
पर तुम्हारे साथ नही हूँ

आज मैं रात का आसमान हूँ,
जो अंधकार को अपने भीतर निगलकर
तुम्हें चाँद सितारों की रोशनी में समेट लेती हूं

आज मैं समुंदर की बेखौफ लहरें हूँ
मेरी भी कुछ भागीदारी है सरकश-तूफ़ाँ में,
तुम्हारी खिड़की पर जो बिजली कौंधती हैं,
कुछ वैसा सा ही फ़ितूर हूँ

आज शिकायत नही मुझे अपनी बिखरी ज़ुल्फ़ों से,
ज़रा ये भी भर ले अपनी मन-पसंद उड़ान
शबाब के बेवफ़ा पैमाने में

आज मैं तुम्हारे साथ नही हूँ,
मैं वक़्त के साथ हूँ-
तुमसे जुड़ी हर आहट से वाकिफ़ हूँ,
पर तुम्हारे साथ नही हूँ

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आज पूरी रात बारिश होती रही
हवा की पत्तियों से गुफ़्तगू चलती रही

घर के भीतर वही रेगिस्तान रहा
जज़्बातों और अल्फ़ाज़ों का

बंजर रही हर कोने में बसी धड़कन
किताबों के बीच की धूल
पर्दों के सिलवटों की तड़पन

कई दफ़ा, मैं खिड़की पे खड़े रही
भीगने की कोशिश करती रही
पर एक क़तरा भी बटोर न पायी

मेरी खिड़की पे एक बेल उग रही, फैल रही है
और दिन-प्रतिदिन तितलियों को अपनी महक से आकर्षित कर रही है-
मानो उस ख्वाब की तरह, जो मुझे झकझोर के बैठा है
आहिस्ता फैलता रहता है, मेरे दिलो-दिमाग में,
मगर बाहर की दुनिया से परिचय में कसमसाता है

शायद वोही ख्वाब,
जो उनके ज़ोर से बोलने पे
पलंग के नीचे छुप जाता है

शायद वोही ख्वाब,
जो कुछ पैसो के लिए
लोगों की सहमती के लिए, बिक जाता है

शायद वोही ख्वाब,
जिसकी आवाज़ दबा दी गयी है कही
रसोई के बर्तनों की शोर में

वो ख्वाब जो अक्सर तुम्हें सताता है,
तुम्हें ढंग से सोने नही देता
बात-चीत करने नही देता,
कुछ बौखलाया सा रखता है

हाँ वोही ख्वाब,
जो तुम्हारी साँसों के साथ चलता है
आँखों में बसता है
और फिर भी तुम्हें दिखाई नही देता

दहलीज़

हाथों की लकीरों से बेबस हूँ-
यूँ ही कागज़ को किस्मत समझके,
अपने कलम को आज़माता रहता हूँ-
लकीरें बनाता हूँ, बिगाड़ता हूँ
अल्फ़ाज़ों से खेलता हूँ, जूझता हूँ

पता नही किसको सम्पूर्ण रखने
की कोशिश मे है हम दोनो-
ये काग़ज़ मेरी तन्हाई का बयान है..
या मैं इस काग़ज़ की कोई आरज़ू?

दूर कही किसी दरिया में,
एक मांझी दोबारा किनारा भटक जाता है
सर्द हवाएँ चलती है,
और एक मुसाफिर फिर तालाबंद खड़ा रह जाता है

वोह तो कुछ कशिश है उस चाँद की
जो शब-ए-फुरकत बन जाता है फरियादों का बादल
हर बीतते पल में, तुझ से जुड़ी हर
फ़रियाद की आहुति दे दी जाती है

कौन किसकी दहलीज़ पे है इंतेज़ार में खड़ा,
यह चक्रव्यूह है जिंदगी भर का
हाथों की लकीरों से बेबस हूँ-
शायद इसीलिए कागज़ को किस्मत समझके,
अपने कलम को आज़माता रहता हूँ..

लफ़्ज़ों से परे चले

चलो आज लफ़्ज़ों से परे चले
एक और नया सफर तय करे
खामोशी की रज़ाई मे लिपटा हुआ
यह जो चाँद है
चलो आज उसको नींद से जगाये

शोख हवाओं की मस्तियों में
हमारी नोक-झोक की सरगोशियों में
शाम ढलती नही, ये चाँद सो जाता है
हमारी नींद उड़ा जाता है

चलो आज लफ़्ज़ों से परे चले
एक और नया सफर तय करे
खामोशी की रज़ाई मे लिपटा हुआ
यह जो चाँद है
चलो आज उसको नींद से जगाये

सफर लंबा है, थोड़ा लाचार भी
सामाजिक तरकीबों की उफनती नदिया हैं
तुम डरना मत, ऐसा करना मेरे खतों का एक पुल बना देना
और हम उन लफ़्ज़ों में दबे मौन की रस्सी
के सहारे पार कर लेंगे

चलो आज लफ़्ज़ों से परे चले
एक और नया सफर तय करे
खामोशी की रज़ाई मे लिपटा हुआ
यह जो चाँद है
चलो आज उसको नींद से जगाये

सफर लंबा है, पर नामुमकिन नहीं
दुनियादारी की बेशुमार अंधेर गलियों में,
तुम खोना मत,
मैं तुम्हारी सादगी की लैंटर्न ले कर
तुम तक जाने वाले राहगुज़र ढूंढ लुंगी

चलो आज लफ़्ज़ों से परे चले
एक और नया सफर तय करे
खामोशी की रज़ाई मे लिपटा हुआ
यह जो चाँद है
चलो आज उसको नींद से जगाये

लेन-देन की बातों से अक्सर मुँह फेर लिया करते हो,
लेकिन घड़ी-घड़ी नज़रों का हिसाब रखते हो

यूँ लफ़्ज़ों की हिमायत, नापी-तोली हुई गुफ़्तगू,
मुख़्तसर मुलाकातें, और बेखबर झलक की आरज़ू

..खूब कमाल के व्यापारी दिखाई पड़ते हो!

Looking closely

The world doesn’t burn out of hatred,
it burns out of the varied acts of indifference-

of how we refuse to see what we must see,
of how we refuse to learn what we must learn

Nothing ever makes a difference,
or may be everything does in its own crooked ways

I looked at and then looked away-
the tattered clothes on shivering bodies
lying shamelessly under the bridge
on one of the coldest January nights

I looked at and then looked away-
the streets of rioting mob claiming
forsaken identities and amidst it,
my life and the inconveniences of running daily errands

I looked at and then looked away-
smog filled dreams of a burgeoning city,
and a child’s inability to fathom
stories of a star-studded sky

You looked at and then looked away-
my hopeful eyes awaiting the spring
where we left each other last,
the gardens we planted and rooms we adorned
within the fragile walls of our invincible hearts

You looked into all of that-
an era that never changed into anthing else,
And then never looked back

And the world nearly ended
between looking at and looking away

 
I hope you look closely.