Unacquainted Silhouettes

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कुछ बेदर्दी का अफसाना ज़माना फुसफुसाता चला गया
कुछ तनहा रातों की शिकायतें बढ़ती चली गयी 
 
 
मेरी खुश किस्मती थी, जो हवा के झोके से
तेरी खुशबू मेरी रूह से आ टकराई 
 
 
यूँ तुझमे खुद ही को फना करके,
मैं ज़माने को ग़ज़ल-ए-इबादात बना चला !
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