A language without residence

I don’t blame the dialect
of our misunderstanding –
some cities I consumed,
some cities consumed me
My heart is a lump of
smoke of harrowing dreams
and nostalgia from every
city that abandoned me

Always moving, always embracing
forging homes out of strange places,
forging friendships out of strange people
like the happiness of the spring-
the lurking of a feeble weather
that only appears to perish

Yet I don’t blame the dialect
of our misunderstanding-
my language is not what I say
or how I speak, its one of those
trees logged down in the forest
with no clear purpose
It’s a battle long lost to
the cities I lived, people I met
and words that colonized

Now I am unilingual,
I only speak what I hear

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In your fondness, Makhdoom Saab

In my fondness for Makhdoom Saab,
and his fondness for flowers
.
.
.
“फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात है या बारात फूलों की”
.
.
.
Night conspires with the blooming flowers
fragrance is what is left for dreams to stir
Every night, a flower of dreams
or a dream of flowers-
A recurrent journey of sublime beauty
as if everything lasts, or nothing
What is left of morning anyway
that is shriveled up in reality?
I carry you in the unfading petals
of a flower that once was,
stashed in moist pages of
a forgotten book,
beaten away in seasons
Yet evergreen in time,
like those wildflowers sprouting
on the attic almost out of nowhere

आज मैं तुम्हारे साथ नही हूँ,
मैं वक़्त के साथ हूँ-
तुमसे जुड़ी हर आहट से वाकिफ़ हूँ,
पर तुम्हारे साथ नही हूँ

आज मैं रात का आसमान हूँ,
जो अंधकार को अपने भीतर निगलकर
तुम्हें चाँद सितारों की रोशनी में समेट लेती हूं

आज मैं समुंदर की बेखौफ लहरें हूँ
मेरी भी कुछ भागीदारी है सरकश-तूफ़ाँ में,
तुम्हारी खिड़की पर जो बिजली कौंधती हैं,
कुछ वैसा सा ही फ़ितूर हूँ

आज शिकायत नही मुझे अपनी बिखरी ज़ुल्फ़ों से,
ज़रा ये भी भर ले अपनी मन-पसंद उड़ान
शबाब के बेवफ़ा पैमाने में

आज मैं तुम्हारे साथ नही हूँ,
मैं वक़्त के साथ हूँ-
तुमसे जुड़ी हर आहट से वाकिफ़ हूँ,
पर तुम्हारे साथ नही हूँ

आज पूरी रात बारिश होती रही
हवा की पत्तियों से गुफ़्तगू चलती रही

घर के भीतर वही रेगिस्तान रहा
जज़्बातों और अल्फ़ाज़ों का

बंजर रही हर कोने में बसी धड़कन
किताबों के बीच की धूल
पर्दों के सिलवटों की तड़पन

कई दफ़ा, मैं खिड़की पे खड़े रही
भीगने की कोशिश करती रही
पर एक क़तरा भी बटोर न पायी

मेरी खिड़की पे एक बेल उग रही, फैल रही है
और दिन-प्रतिदिन तितलियों को अपनी महक से आकर्षित कर रही है-
मानो उस ख्वाब की तरह, जो मुझे झकझोर के बैठा है
आहिस्ता फैलता रहता है, मेरे दिलो-दिमाग में,
मगर बाहर की दुनिया से परिचय में कसमसाता है

शायद वोही ख्वाब,
जो उनके ज़ोर से बोलने पे
पलंग के नीचे छुप जाता है

शायद वोही ख्वाब,
जो कुछ पैसो के लिए
लोगों की सहमती के लिए, बिक जाता है

शायद वोही ख्वाब,
जिसकी आवाज़ दबा दी गयी है कही
रसोई के बर्तनों की शोर में

वो ख्वाब जो अक्सर तुम्हें सताता है,
तुम्हें ढंग से सोने नही देता
बात-चीत करने नही देता,
कुछ बौखलाया सा रखता है

हाँ वोही ख्वाब,
जो तुम्हारी साँसों के साथ चलता है
आँखों में बसता है
और फिर भी तुम्हें दिखाई नही देता

दहलीज़

हाथों की लकीरों से बेबस हूँ-
यूँ ही कागज़ को किस्मत समझके,
अपने कलम को आज़माता रहता हूँ-
लकीरें बनाता हूँ, बिगाड़ता हूँ
अल्फ़ाज़ों से खेलता हूँ, जूझता हूँ

पता नही किसको सम्पूर्ण रखने
की कोशिश मे है हम दोनो-
ये काग़ज़ मेरी तन्हाई का बयान है..
या मैं इस काग़ज़ की कोई आरज़ू?

दूर कही किसी दरिया में,
एक मांझी दोबारा किनारा भटक जाता है
सर्द हवाएँ चलती है,
और एक मुसाफिर फिर तालाबंद खड़ा रह जाता है

वोह तो कुछ कशिश है उस चाँद की
जो शब-ए-फुरकत बन जाता है फरियादों का बादल
हर बीतते पल में, तुझ से जुड़ी हर
फ़रियाद की आहुति दे दी जाती है

कौन किसकी दहलीज़ पे है इंतेज़ार में खड़ा,
यह चक्रव्यूह है जिंदगी भर का
हाथों की लकीरों से बेबस हूँ-
शायद इसीलिए कागज़ को किस्मत समझके,
अपने कलम को आज़माता रहता हूँ..

लफ़्ज़ों से परे चले

चलो आज लफ़्ज़ों से परे चले
एक और नया सफर तय करे
खामोशी की रज़ाई मे लिपटा हुआ
यह जो चाँद है
चलो आज उसको नींद से जगाये

शोख हवाओं की मस्तियों में
हमारी नोक-झोक की सरगोशियों में
शाम ढलती नही, ये चाँद सो जाता है
हमारी नींद उड़ा जाता है

चलो आज लफ़्ज़ों से परे चले
एक और नया सफर तय करे
खामोशी की रज़ाई मे लिपटा हुआ
यह जो चाँद है
चलो आज उसको नींद से जगाये

सफर लंबा है, थोड़ा लाचार भी
सामाजिक तरकीबों की उफनती नदिया हैं
तुम डरना मत, ऐसा करना मेरे खतों का एक पुल बना देना
और हम उन लफ़्ज़ों में दबे मौन की रस्सी
के सहारे पार कर लेंगे

चलो आज लफ़्ज़ों से परे चले
एक और नया सफर तय करे
खामोशी की रज़ाई मे लिपटा हुआ
यह जो चाँद है
चलो आज उसको नींद से जगाये

सफर लंबा है, पर नामुमकिन नहीं
दुनियादारी की बेशुमार अंधेर गलियों में,
तुम खोना मत,
मैं तुम्हारी सादगी की लैंटर्न ले कर
तुम तक जाने वाले राहगुज़र ढूंढ लुंगी

चलो आज लफ़्ज़ों से परे चले
एक और नया सफर तय करे
खामोशी की रज़ाई मे लिपटा हुआ
यह जो चाँद है
चलो आज उसको नींद से जगाये